आलेख:- डाॅ. ललित तिवारी,कुँमाऊ विश्वविद्यालय नैनीताल।
नैनीताल:-उत्तराखंड की आराध्य राजराजेश्वरी हिमालयी संस्कृति को जोड़ने वाली माँ नंदा सुनंदा की मूर्ति का आधार कदली है । कदली जिसे बनाना प्लेंटेन (Banana Plantain) भी कहते है तथा इसका वानस्पतिक नाम मुजा पैराडाइसिएका (Musa paradisiaca) कुल मुसासी (Musaceae) है । यह एक बार फल देता है ,भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ने वाले कदली को पवित्र ,पूजनीय , दिव्य,धार्मिक एवं आध्यात्मिक मन गया है जिसमें भगवान विष्णु ,गुरुदेव बृहस्पति के साथ लक्ष्मी का वास माना जाता है । कदली के जड़ में शिव का तथा मूल में विष्णु विराजते है ।इसके पत्तों से पवित्र आसन , पात्र ,तथा शुद्धता से भोजन पात्र भी है ।केले के पेड में लकड़ी नहीं होती जो अहंकार माया के त्याग का प्रतीक है , यह वंश वृद्धि एवं निरंतरता की प्रेरणा देता है । आयुर्वेद में औषधि ,ऊर्जा देने वाला ,पचने में आसान के साथ पारिस्थिकी में गलन शील है। केले को भानुफल ,गज वसा ,कुंजरसत , मोचा ,रंभ भी कहते है जिसमें कैल्शियम ,मैग्नीशियम , आयरन, फॉस्फोरस ,कॉपर ,फाइबर ,के साथ एंटी आक्सीडेंट भी मिलते है ।यह पारिस्थितिक अनुकूल है। कदली वन हनुमान आराधना के लिए शुभ माना गया है । महर्षि दुर्वासा ने कदली की उत्पत्ति राख से की तथा इसका हर भाग लाभप्रद है । संपन्नता ,अच्छे स्वास्थ्य के प्रतीक केले की उत्पत्ति 10 हजार वर्ष पूर्व मानी जाती है । साउथ ईस्ट एशिया से पैदा हुए यह सबसे ज्यादा भारत फिर चीन फिर इंडोनेशिया में होता है । कदली बड़े पत्तों के कारण कार्बन सिंक , कार्बन शोषण का कार्य करता है ,मृदा अपरदन को रोकता ,बायोमास के साथ खाद निर्माण ,जल संचय ,वाटर टेबल में सुधार , परागण,आश्रय के साथ फाइटरिमीडिएशन भी करता है।केला भोजन भी है तथा न्यूट्रिशियस भी। पारिस्थितिक अनुकूलन के कारण इसी काफली तने पर मां नंदा सुनंदा की मूर्ति का निर्माण किया जाता है जो प्रकृति के साथ अध्यात्म ,शक्ति एवं परंपरा को प्रदर्शित करता है ।




