उपाकर्म (हरियाली) : वैदिक काल से चली आ रही है उपाकर्म की परम्परा, जाने…. सामवेदियों का सामनागाय उपाकर्म बाद में क्यों होता है।

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आलेख – बृजमोहन जोशी,नैनीताल।

साभार- आचार्य श्री भुवन चंद्र त्रिपाठी

……… मैं पिछले कई वर्षों से हड़ताली विषय पर हास्योक्त्त त्रुटि…. ? विषय- तेवाड़ियों की जनेऊ सियार उठा ले गया..? पर जानकारी खोज रहा था, कि सामवेदियों का सामनागाय उपाकर्म बाद में क्यों होता है….. ?
संयोग से वर्ष २०२३ में श्री मां नयना देवी मंदिर नैनीताल में श्री मां नयना देवी स्थापन दिवस के शुभ अवसर पर श्री मां नयना देवी अमर उदय ट्रस्ट द्वारा आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा यज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें कथा वाचक पण्डित आचार्य भुवन चंद्र त्रिपाठी जी से हड़ताली तृतीया व्रत, गौतम गोत्रीय सामनागाय उपाकर्म के विषय पर जो बहुमूल्य जानकारी श्री भुवन चंद्र त्रिपाठी जी से प्राप्त हुई तथा अपने व्यक्तिगत अध्ययन के आधार पर जो भी जानकारी प्राप्त हुई उस जानकारी को संक्षिप्त रूप में आपके साथ सांझा कर रहा हूं।
मैं पहले बात करता हूं ‘उपाकर्म ‘ की।
प्राचीन काल से ही ‘उपाकर्म ‘अर्थात यज्ञोपवीत धारण करने की दो शास्त्रीय परम्पराएं प्रचलित है। पहली ‌श्रावण मास में होने वाला उपाकर्म पर्व सदा श्रवण नक्षत्र के संयोग पर ही मनाया जाता है। यजुर्वेदी ब्राह्मणों द्वारा यह उपाकर्म तीन प्रमुख योगों पर किसे जाने की शास्त्रीय मान्यता प्रचलित है।
१- श्रावणी पूर्णिमा
२- श्रावण शुक्ल पंचमी

३- श्रावण शुक्ल पंचमी युक्त ‘ हस्त नक्षत्र ‘! दूसरे और तीसरे योग पर तभी विचार किया जाता है जब श्रावण पूर्णिमा के दिन ग्रहण या संक्रांति हो तो, कोई अन्य प्रकार का विघ्न आ गया हो, दूसरी उपाकर्म की परम्परा सामवेदी गौतम गोत्र के तिवारी/ तिवाड़ी, त्रिपाठी, त्रिवेदी आदि ब्राह्मण समुदायों में प्रचलित है जो सदा भाद्र पद शुक्ल हस्त नक्षत्र के दिन ही मनाई जाती है।
…हमारे यहां बोली जाने वाली भाषा में कुमाऊंनी त्यार शब्द त्योहार का वाचक है जिसमें पर्वोत्सव का भाव निहित है। कुमाऊंनी त्यार परम्परागत है इनको सामूहिक उत्सव कहना अधिक उपयुक्त है। ऐसा ही एक त्यौहार है हड़ताली/ हरताली – हरितालिका।
हड़ताली के दिन सामवेदी गौतम गोत्रीय (सामनागाय उपाकर्म) अपना यज्ञोपवीत (जनेऊ) बदलते हैं ,रक्षा सूत्र को हाथ की कलाई में बांधकर रक्षा बंधन का त्योहार मनाते हैं।जिस तरह ऋग्यर्जुवेदी भाद्र कृष्ण पक्ष श्रावणी पूर्णिमा के दिन उपाकर्म (जनेऊ) व रक्षा धारण कर इस त्योहार को मनाते हैं, ठीक उसी तरह से गौतम गोत्रीय भी हरताली के दिन इस त्योहार को मनाते हैं।
लोक विधान के अनुसार – किसी गाड़ -‌ गधेरे,नौले, गूल , नदी के किनारे जहां जल हो,वहां गोबर व तुलसी की मिट्टी के लेप को पहले अपने शरीर में लगाते है तत्पश्चात स्नान करते हैं, फिर ऋषि तर्पण कर सप्त ऋषियों के पूजनोपरांत प्रतिष्ठित जनेऊ को बदलकर रक्षासूत्र बांधते हैं। अर्थात रक्षा बंधन का त्योहार मनाते है। रक्षा सूत्र बांधते समय यह मंत्र पढ़ा जाता है।
येन बद्दो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चलः
।।
(विष्णु पुराण वामन अवतार)
इस मंत्र का अर्थ है कि ” जिस प्रकार यह रक्षा सूत्र महान् व पराक्रमी राजा बलि को श्री मां लक्ष्मी जी द्वारा बांधा गया था (श्री विष्णु जो राजा बलि द्वारा मांगे वचन अनुसार पाताल लोक में उनके द्वारपाल बन कर रह रहे थे। रक्षा सूत्र के वचन अनुसार बलि ने श्री विष्णु को वचन से मुक्त कर श्री लक्ष्मी जी के साथ जाने दिया)। उसी प्रकार यह रक्षा सूत्र मैं तुम्हें बांधता/ बांधती हूं। यह रक्षा सूत्र तुम्हारी रक्षा करें और तुम अपने पथ पर अडिग रहो और अपनी रक्षा के संकल्प को राजा बलि की तरह निभाओ।
भाद्र पद शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाऐ जाने वाले इस व्रत को हरितालिका कहते हैं।
मेरा मानना है कि हमारे ऋषि मुनियों ने वेदों के अनुसार इस उपाकर्म हेतु अलग-अलग तिथियों का निर्धारण किया होगा। ऋग्यर्जुवेदियों के लिए श्रावणी पूर्णिमा के दिन तथा साम वेदियों के लिए भाद्र शुक्ल पक्ष तृतीया को हरितालिका (हड़ताली) का दिन।
पण्डित आचार्य भुवन चन्द्र त्रिपाठी जी के अनुसार -विषय- साम वेदियों का उपाकर्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष हस्त नक्षत्र युक्त तिथि में होता है। जैसा कि सामान्य लोग तेवाड़ियों की जनेऊ सियार उठा ले गया था इसलिए श्रावण पूर्णिमा को न मनाकर भादौ में यह व्रत किया जाता है ऐसा कहते हैं। जो कि पहले एक मजाक के तौर पर लोग कहते थे…। नये समय में उसी हास्योक्ति को सच मानने लगे हैं। वास्तव में ऐसा नही है। आइये इस विषय पर थोड़ी चर्चा करने से स्पष्ट हो जायेगा। अलग- वेदों के आधार पर उपाकर्म-
ऋग्वैदियों के उपाकर्म के तीन काल हैं।
१-श्रावण महीने में जब श्रवण नक्षत्र हो।
२-श्रावण शुक्ल पंचमी।
३-जब हस्त नक्षत्र हो।पूर्णिमा भी हो सकती है।
यर्जुर्वेदियों का उपाकर्म
श्रावण पूर्णिमा को होता है।
अथर्व वेदियों का उपाकर्म-
१-श्रावण पूर्णिमा या भाद्रपद की पूर्णिमा।
२- श्रवण नक्षत्र के आधार पर जैसे ऋग्वेदियों का कभी चतुर्दशी को कभी त्रयोदशी को होता है।
सामवेदियों का उपाकर्म –
भाद्रपद शुक्ल पक्ष में हस्त नक्षत्र में होता है।
पराशर एवं माधव के ग्रन्थों में-
१-सामगानांसिंहस्थ रवौयुक्ते
२-ऋष्यश्रृंग मुनि का वचन-
सामग विषये तेषां सिंहार्क एवोक्तं।अर्थात सभी सामवेदियों का चाहे वो किसी भी शाखा के हों उनका उपाकर्म भाद्रपद के शुक्ल पक्ष हस्त नक्षत्र में ही होगा।ऐसे ही वाक्य गोभिलगृह्य सूत्र में भी कहे गए हैं। अतः स्पष्ट है कि यह सामवेदियों का पर्व वेदोक्त है।जैसे कि अन्य वेदों के बारे में थोड़ी भिन्नता है। यह विषय गहन है। जन सामान्य कि जिज्ञासा के लिये शास्त्रों के अनुसार अति संक्षेप में मैने अपनी अल्प मति के अनुसार इसे लिखने का प्रयास किया। इसमें स्वनाम धन्य श्रीयुत श्री बृजमोहन जोशी जी का आग्रह रहा तभी यह कार्य सम्भव हुआ। विद्वदजन त्रुटियों के लिये मुझे क्षमा करेंगे।
उपाकर्म का तीसरा चरण स्वाध्याय का है इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रृद्धा,मेधा, प्रज्ञा, स्मृति,
सदस्यपति, अनुमति, छंद, और ऋषि को घी की आहूति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग वेद के मंत्रों से आहूतियां दी जाती हैं।इस यज्ञ के बाद वेद वेदांग का अध्ययन आरम्भ होता है। वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ‘ उपाकर्म ‘को उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। भारतीय जीवन दर्शन की दृष्टि से यह ‘उपाकर्म ‘ विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है श्रावणी ‘उपाकर्म ‘ करने के बाद जब ब्राह्मण घर लौटता था तो तब बहनें उसके हाथ में रक्षा सूत्र बांधती थी।
….हरितालिका – धार्मिक मान्यतानुसार -इस व्रत की कथा पार्वती-शिव वार्तालाप है अर्थात पार्वती को कितने ही कठोर तप करने के बाद भगवान शिव पति रूप में मिले। व्रत कथा के अनुसार- बारह वर्ष की कठिन तपस्या ,चौंसठ साल तक सूखे पत्ते खाकर शिव की आराधना पार्वती ने की थी।माघ मास में वह जल में बैठी रही,और बैशाख मास में वह अग्नि के निकट।
देवर्षि नारद ने हिमालय राज को सलाह दी कि वह अपनी कन्या का विवाह भगवान विष्णु से कर दें,और ऐसा ही हुआ,और नारद यह शुभ समाचार देने भगवान विष्णु के पास चल दिए। लेकिन जब पिता ने पुत्री को यह बात बतलाई तो पार्वती दुःखी हो गई और अपनी सहेली के घर चली गई वहां उन्हें रोता व दुःखी देखकर एक सखी ने वादा किया कि वह हर प्रकार से पार्वती कि सहायता करेगी,अगर वह उसे अपने दुःखी होने का कारण बता दें। पार्वती ने बतलाया कि वह मात्र शिव को ही अपना पति चुनना चाहती है अन्यथा वह अपने प्राण त्याग देगी।सखियों ने पार्वती को अपने साथ छिपाकर रख लिया वहीं पर्वत की एक कंदरा में, पार्वती ने उसी स्थान पर शिव की मिट्टी की मूर्ति बनाई और उनकी आराधना में लीन हो गयी। पार्वती ने व्रत किया और कठिन तपस्या की, तपस्या से प्रसन्न हो शिव प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती की इच्छा पूछी और फिर उन्हें वचन दिया कि वह उन्हें पति के रूप में अवश्य प्राप्त होंगे।तत्पश्चात अपनी पुत्री का अन्वेषण करते हुए हिमवान भी वहां आ पहुंचे और सब बातें जानकर उन्होंने पार्वती का विवाह भगवान शंकर के साथ कर दिया अन्ततः बर उ शंभु न त रहउ कुमारी।
पार्वती के इस विचल अनुराग की विजय हुई। देवी पार्वती ने भाद्र शुक्ल पक्ष तृतीया को हस्त नक्षत्र में शिव की आराधना की थी,इसीलिए इस तिथि को यह व्रत किया जाता है।तभी से भाद्र पद शुक्ल तृतीया को स्त्रियां अपने पति कि दीर्घायु के लिए यथा कुंवारी कन्याएं अपने मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए हरितालिका (हड़ताली) का व्रत करती चली आ रही है।
।। आलिभिहररिता यस्मात-
तस्मात सा हरितालिका।।
सखीयों के द्वारा हरी (अपहरण करने के कारण ) – इस व्युत्पत्ति के अनुसार इस व्रत का नाम हरितालिका (हड़ताली) हुआ। इस व्रत के अनुष्ठान से नारी को अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।पार्वती के द्वारा शिव की मिट्टी की मूर्ति का निर्माण कर पूजन किया गया था,उसी के अनुसार हमारे पर्वतीय अंचल कुमाऊं में आज भी लोक शिल्प विधा के अन्तर्गत इस दिन महिलाओ के द्वारा डिकर शैली में अर्धनारीश्वर की मूर्ति का निर्माण कर पूजन किया जाता हैं।
…पूर्व समय में ऋषि मुनि राजाओं के हाथ में (धागा – सूत)सूत्र बांधकर यह वचन ले लिया करते थे कि वह सदैव इस समाज और धर्म की रक्षा करते रहेंगे। इसके साथ आध्यात्मिक रहस्य भी जुड़ा है, जिस बंधन से हमारी रक्षा हो सके उसे ही रक्षा बंधन कहा जाता है।
प्राचीन समय में उपाकर्म का यह त्यौहार ऋषि मुनि अपने शिष्यों के साथ अपने आश्रम में मनाते थे। जनेऊ तब धारण की जाती थी जब गुरु शिष्य को शिक्षा देना स्वीकार करते थे।जनेऊ का इतना अधिक महत्व होता है कि इसको धारण करने के उपरान्त नियमित गायत्री मंत्र का जाप करने के उपरान्त यदि उस व्यक्ति को कुछ भी न आता हो तब भी उसके साथ साथ नौ दैवीय शक्तियां उसके शरीर में हमेशा चलती रहती हैं। यह नौ सुत्र,नौ लड़ी नौ देवताओं के प्रतीक रूप भी है। गायत्री मंत्र का दूर प्रयोग बहुत ही हानिकारक भी है।
निष्कर्ष –
वैदिक काल से चली आ रही परम्परागत उपाकर्म पद्धति के अनुसार ऋग्वेदी एवं यजुर्वेदीय ब्राह्मण श्रावणी पूर्णिमा को तथा सामवेदी ब्राह्मण भाद्र पद मास के’ हस्त नक्षत्र ‘में हरियाली तीज के अवसर पर यज्ञोपवीत धारण करते हैं जिसे धर्म शास्त्रीय शब्दावली मे ‘उपाकर्म ‘ संस्कार के नाम से भी जाना जाता है।आप सभी मित्रों और सामवेदी ब्राह्मणों बंधुओं,गुरू जनों को ‘ हरताली ‘ और उपाकर्म पर्व की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
सर्वेष सुदिनं भवतु।

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