लोक पर्व (घ्यूं सङरात) : इस दिन घी का सेवन नहीं करेंगे वह अगले जन्म में गनेल योनि में जन्म लेंगे, लोक उत्सव किसी भी समाज की अभिव्यक्ति के सर्वाधिक सशक्त माध्यम।

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आलेख व छायाकार- बृजमोहन जोशी, नैनीताल।


नैनीताल:- लोक पर्व हमारी संस्कृति के पोषक है,जीवन शक्ति हैं। इस पर्वतीय अंचल में त्यौहार और पर्व ‌ऋतु परिवर्तन से जुड़े हैं।आज समूचे कुमाऊं अंचल में भादो माह की सङरात को अर्थात दिनांक १७ अगस्त २०२६ दिन सोमवार को मनाया जा रहा है घ्यूं सङरात (घी संक्रांति) अर्थात ओगि त्यार। घ्यूं अर्थात (घी)। इसे यहां ओगि/ओलगि/सिंह संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है।इस दिन द्विज वर्ग के लोग एक-दूसरे को अपने अपने गुसाईयों के लिए ओगि/ओग लाते हैं।ओग में मौसमी फल,सांग-सब्जी, छिलुके,पत्तल,मावा के पत्तों से बनी बरसाती (टवप ) तथा गडेरी (पिनालू) के कोमल पत्ते (गाब) भेंट स्वरूप लाते थे और बदले में उनसे भेंट प्राप्त करते थे।
लोक जीवन में जो व्यक्ति जिस कार्य में निपुण होता था, दक्ष होता था वह अपने अपने हाथों से बनीं वस्तुओं को अपने अपने गुसाइयों के लिए भेंट स्वरूप लाते थे और बदले में भेंट प्राप्त करते थे, मेरा यह मानना है कि यह लोक परम्परा आदान-प्रदान (वस्तु विनिमय) परम्परा का ही एक बदला हुआ रूप है। इसके मूल में एक दूसरे को भेंट देने की परम्परा जुड़ी हुई है।
इस संक्रांति से एक दिन पहले मसान्त को घर घर मे अपनी-अपनी सामर्थानुसार उड़द कि दाल से बनी रोटियां जिन्हें स्थानीय भाषा में (बेणु रव्ट) कहा जाता है बनायी जाती हैं और घी के साथ खाने की लोक परम्परा है, घी में ही सभी पकवान बनते हैं। इस दिन सभी देवी देवताओं कि मूर्तियों में भी घी लगाया जाता है। घी का दीपक जलाया जाता है,घी का टीका लगाया जाता है। घी में ही नैवेद्य बनाये जाते हैं,इस दिन खीर के साथ भी घी खाने की लोक परम्परा है। एक ऐसी लोक धारणा भी हमारे इस अंचल में प्रचलित है कि जो लोग इस दिन घी नहीं खायेंगे घी का सेवन नहीं करेंगे वह अगले जन्म में गनेल (घैंघा) किड़े कि योनि में जन्म लेंगे।
हमारे इस अंचल में इस माह घर घर में दूध, दही, घी की भरमार होती है और इस माह शरीर कि मांग/आवश्यकता भी होती है कि घी का‌ प्रयोग किया जाये इस कारण हमारे पूर्वजों ने अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु ये युक्ति निकाली कि जो लोग इस माह घी नहीं खायेंगे घी का सेवन नहीं करेंगे वह अगले जन्म में गनेल कि योनि में जन्म लेंगे।
इस माह इस अंचल के वादि लोग,औजी, लोहार, बढंई ,ओण -बारुणी, दर्जी लोग अपने अपने हाथों से बनीं वस्तुओं को उपहार स्वरूप ओग के रूप में अपने अपने गुसाईयों को भेंट स्वरूप देते थे व बदले में उनसे भेंट प्राप्त करते थे।
इस दिन परिवार के सदस्य अपने अपने भूमिया,ईष्ट देवी देवताओं के थान में जाकर इस मौसम के फल फूल, सांग सब्जी, नैवेद्य, दूध, दही, घी, पिनालु के गांव, दाड़िम,भुट्टा, कंकड़ी, आदि चढ़ाते हैं और उसके बाद ही स्वयं उपयोग करते हैं।
हमारे इस अंचल में पिनालू कि सब्जी “गांव” खाने का शुभारंभ इसी दिन से होता है। भूमिया से,लोकदेवी-देवताओं से प्रार्थना कि जाती है कि भविष्य में भी अच्छी फसल होती रहे। इस प्रकार यह त्योहार आपसी प्रेम सौहार्द्र, भाई चारे को बढ़ाने वाला व आपसी द्वेष को दूर करने वाला त्योहार भी है।
लोक उत्सव किसी भी समाज की अभिव्यक्ति के सर्वाधिक सशक्त माध्यम होते हैं, इसमें स्थानीय समुदाय के विविध रूप देखे जा सकते हैं,ये उत्सव जहां एक ओर हमें अपनी जड़ों की ओर लौटाते हैं। सामूहिकता का भान कराते हैं। वहीं हमें अपने अतीत से सिखने को भी प्रेरित करते हैं।
आप सभी महानुभावों को घ्यूं संक्रांति के पर्व कि हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।

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