श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का तृतीय दिवस,अन्तःकरण निर्मल करना केवल कथा,कीर्तन, सत्संग से ही सम्भव है।

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आभार:- बृजमोहन जोशी, नैनीताल।

नैनीताल:- श्री मां नयना देवी जन्म शताब्दी समारोह के शुभ अवसर पर श्री मां नयना देवी अमर उदय ट्रस्ट द्वारा दिनांक १५ जून से २३ जून २०२६ तक आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के तृतीय दिवस प्रातःकाल आचार्य – मोहन चंद त्रिपाठी सामवेदाचार्य, ब्रह्मा- मुकेश चन्द्र जोशी (शास्त्री), उप व्यास – गिरीश चंद्र तिवारी, तथा व्यास- पण्डित चन्द्रशेखर अधिकारी जी द्वारा विधिवत पूजन अर्चन किया गया।
यजमानों में मुख्य यजमान – श्रीमती देवन चौधरी एवं श्री मनोज चौधरी, श्रीमती मुन्नी भट्ट एवं महेश भट्ट।
श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस कथा का शुभारंभ व्यास जी पण्डित चन्द्रशेखर अधिकारी जी द्वारा मंगलाचरण के साथ आरंभ किया गया।
व्यास जी के कल के प्रसंग से आज की कथा का आरम्भ बहुत ही सुन्दर भजन-
प्रभु प्यारे से जिसका सम्बन्ध है, उसे हर घड़ी आनन्द ही आनन्द है। उसकी रजा में जो रजामंद है, उसे हर घड़ी आनन्द ही आनन्द है।।
कल की विश्राम कथा से आगे की कथा राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय की कथा से कथा को आरम्भ करने से पहले जय कारा लगाने के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी दी कि हमें किसी भी धार्मिक कार्य का आरम्भ जय कारा लगाकर करना चाहिए और यह जयकारा इतनी जोर से होना चाहिए कि उससे चारों दिशाओं में जय जय कार हो। व्यास जी के साथ सभी आचार्यों ने, संगीत कारों ने,श्रोताओं ने, यजमानों ने, जयकारे लगाये।
व्यास जी ने कहा कि श्री मां नयना देवी मंदिर नैनीताल में श्री अमर उदय ट्रस्ट द्वारा आयोजित यह श्री मद्भागवत भक्ति का प्रयोजन व्यक्ति का प्रयोजन नहीं है यह तो श्री मां नयना की प्रेरणा से हो रहा है। यह सब ईश्वर के अनुग्रह से होता है, आप और हम तो केवल निमित्त मात्र है। नैनीताल में श्री मां नयना के प्रकट होने का उद्देश्य भक्तों की रक्षा व मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए ही यहां नैनीताल में श्री मां का नयना का प्रार्दुभाव हुआ है। श्रीमद् देवी भागवत देवी का ही रूप है। हम सब को इस जीवन में भक्ति का खाता खोलना चाहिए। जिससे हम सभी का जीवन सफल हो सके। इसके बाद सात के अंक के महत्व को बतलाया हमारे जीवन में जो भी घटित होता है वह इन सात दिनों में ही होता है इसके बाद व्यास जी ने कथा में प्रवेश किया।
राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय की कथा आरम्भ की। उतंग ऋषि के कहने पर तक्षक नाग को समाप्त करने के लिए तामसी सर्प किया। व्यास जी ने कहा कि यज्ञ का उद्देश्य सर्व जन हिताय होना चाहिए। व्यास जी ने कहा कि मंत्रों का विज्ञान है अर्थात मंत्रों का विशेष महत्व होता है। मन्त्रों के सही उच्चारण का बड़ा महत्व होता है। पाठ के छः दोषों को भी बतलाया। हमें एक आसन में बैठने का अभ्यास होना चाहिए। हमें अपने शरीर को निष्क्रिय नहीं बनाना चाहिए।हमारा हमारी इन्द्रियों में अधिकार होना चाहिए। समस्त देवता मंत्र से सन्तुष्ट होते हैं। ये समस्त विश्व देवताओं के अधिन है,और यह मंत्र विद्वानों के अधिन है। व्यास जी ने नारायण कवच का भी वर्णन किया।और यह बतलाता कि मंत्रों में अपार शक्ति होती है,दैविय उर्जा होती है।
व्यास जी ने कहा कि हमारी मां बहनें साक्षात देवी की मूर्तियां हैं और भागवत में तो देवियां ही देवियां हैं। इसके साथ साथ बहुत ही सुन्दर भजन का गायन किया – प्रभु प्यारे से जिसका सम्बन्ध है, उसे हर घड़ी आनन्द ही आनन्द है।जो उसकी रजा में रजामंद है, उसे हर घड़ी आनन्द ही आनन्द है। व्यास जी ने श्रेष्ठ श्रोताओं के लक्षणों पर भी प्रकाश डाला यदि हमें जीवन में सुख चाहिए तो हमें मां के पास जाना चाहिए जिस तरह हमारी मां हमें सुख देती है और यदि हम जगत जननी मां भगवती की शरण में चले जाएं तो वह क्या नहीं कर सकती। व्यास जी ने कहा कि हमें व्यक्ति के व्यक्तित्व से उसके कुल का पता चलता है उसके व्यवहार से उसके कुल का पता चलता है। व्यास जी ने कि जो वस्तु जितनी मूल्यवान होती है हम उतनी अधिक उसकी सुरक्षा करते हैं। उसे सब के समक्ष प्रस्तुत नहीं करते हैं। व्यास जी ने कथा के बीच बीच में वर्तमान में हमारे घरों कि स्थिति की ओर भी ध्यान दिलाया तथा कई धार्मिक कथाओं के माध्यम से भी जानकारी दी। सृष्टि के जन्म का वर्णन सुनाया तथा आरती करने के माहात्म्य की जानकारी भी दी।
व्यास जी ने इसके बाद देवदत्त पण्डित जी की कथा को बतलाया,व्यास जी ने कहा कि विद्वान की पूजा सर्वत्र होती है,विद्या की बड़ी महिमा है।इस संसार को चलाने वाली जो शक्ति है वो दिव्य शक्ति है। सामवेद के गान का माहात्म्य बतलाया। यज्ञोपवीत संस्कार के महत्व को बतलाया, कहा कि जनेऊ हमारे शरीर का कवच है। स्नान करने की शास्त्रीय विधि भी बतलाई।
व्यास जी के द्वारा राजा जनमेजय को विस्तार से श्रीमद् देवी भागवत कथा का माहात्म्य सुनाया। मां की महिमा का बखान किया। व्यास जी ने कहा कि हमें जगत जननी के चरणों में प्रिती रखनी चाहिए।इस जीवन में भक्ति को बढ़ाने का मार्ग है सत्संग। यह बाहर का श्रृंगार तभी अच्छा लगता है जब हमारे भीतर का श्रृंगार भी अच्छा हो। हमें अपने अन्तःकरण निर्मल करना चाहिए और यह इस कलियुग में केवल कथा, कीर्तन, सत्संग से ही सम्भव है। भौतिक जीवन में हमारा शरीर अनेक दुखों से घिरा हुआ है कलियुग में एक मात्र साधन है यह कीर्तन,कथा, सत्संग। हमें अपने विचारों को बदलने की आवश्यकता है। और यह सब विचारों का ही खेल है। और इसी के साथ आज की कथा को विश्राम दिया।
संगीत के कलाकारों के द्वारा समय-समय पर कथा के आरम्भ में तथा कथा के मध्य तथा कथा के विश्राम के बाद भी सुंदर सुंदर भजनों का गायन किया गया। संगीत कलाकारों में लोकेश पंत, पण्डित राधा कान्त शर्मा, कपिल जी ने सहभागिता की। इस शुभ अवसर पर श्री मां नयना देवी अमर उदय ट्रस्ट के अध्यक्ष राजीव लोचन साह जी, घनश्याम लाल साह, प्रदीप शाह, हेमंत साह,किशन सिंह नेगी, शैलेन्द्र मिलकानी,शैलेश साह,आचार्य बसन्त बल्लभ पाण्डे, बसन्त बल्लभ जोशी, चन्द्र शेखर तिवारी,नवीन तिवारी,भुवन काण्डपाल,गणेश बहुगुणा,अमिता साह,सुमन साह,मंजु रौतेला,राजीव दूबे ,पान सिंह ढैला ,भूवन सिंह एस.एस.यादव आदि उपस्थित रहे।

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