फूल देई:-भारतीय नववर्ष के स्वागत का पर्व, खुशहाली के आगमन का पर्व।

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आलेख व छायांकन:- बृजमोहन जोशी, नैनीताल।

नैनीताल:-आज दिनांक १५ मार्च २०२६ को समूचे उत्तराखण्ड में मनाया जा रहा है फूल संक्रान्ति का यह त्यौहार।
यह लोक पर्व इस अंचल में लगभग एक माह तक विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। कहीं शक सम्वत्सर के स्वागत के रूप में तो कहीं चैत्र माह की विदाई के रूप में भी हम इस त्योहार को वैशाख एक गते को भी मनाते हैं।‌ फूल देई के शुभ अवसर पर इस दिन नन्हे नन्हे बालक और बालिकाओं के द्वारा रिंगाल की टोकरियों में/ थालियों में चावल, गुड़, फूल से उसे परिपूर्ण रखकर सम्बंधित परिवार को सामुहिक रूप से एक बाल गीत के माध्यम से ऐश्वर्यादि की कामना की जाती है। इस बाल गीत के माध्यम से –
फूल देई छम्मा देई,
दैंणी द्वार भर भकार,
यौ देली सौ नमस्कार,
पूजैं द्वार बारंबार….
इस उपलक्ष्य पर प्रत्येक परिवार,आस पड़ोस, गांव के लोगों के द्वारा इन बालक बालिकाओं के बर्तन में यथा शक्ति द्रव्य,चावल, गुड़ आदि भेंट कर सम्मान रूप से इन बालक बालिकाओं को विदा किया जाता हैं।
फूल देई का यह त्योहार भारतीय नव वर्ष के स्वागत का पर्व है। ऋतु परिवर्तन का पर्व है। और इस अंचल में सौर मास का प्रचलन होने से यह दिन भारतीय नव वर्ष का आरम्भ दिन भी माना जाता है।
इस अंचल में घर के प्रवेश द्वार को जिसे स्थानीय भाषा में हम देई/देही/देली/धेई आदि नामों से पुकारते हैं-यह लोक पर्व घर के मुख्य प्रवेश द्वार को पूजने का पर्व है।ऋतु परिवर्तन का पर्व है। खुशहाली के आगमन का पर्व है।हिमालय कि निचली घाटियों में तो इसे यहां राष्ट्रीय त्यौहार के रूप में मनाते हैं।फूल देई कि यह लोक परम्परा हमारी विवाहिता बेटियों के जीवन भर चलने वाली लोक परम्परा है और आज भी वह जब भी अपने ससुराल – अपने मायके आती-जाती है तो घर में प्रवेश करने से पहले देई पूजन अवश्य करती है तब घर में प्रवेश करती है, इतना ही नहीं उसे अपने मायके पहुंचने पर सबसे पहले अपने अपने रिश्तेदारों के घर की देई भी पूजनी अनिवार्य होती है अन्यथा रिश्तेदार उसे टोकते हैं अर्थात उन्हें भी अपनी इस बहू बेटी की प्रतीक्षा रहती है,देली पूजन की आस रहती है।
हमारे इस अंचल में कहीं कहीं इस त्योहार को “हल्दौड़ ” भी कहते हैं। हल्दी की एक गांठ को अभिमंत्रित करके बच्चों के गले में एक ताबीज की तरह इसे पहनाया जाता है ताकि बच्चों को “ज्वक” अर्थात उसे पेट सम्बन्धी ब्याधी न हो। हमारे इस अंचल में इस माह को लाडिलो चैत भी कहा गया है। इसे रंगीला महिना भी माना जाता है। प्रकृति भी रंगीली होती है फलों के वृक्षों में चारों ओर फूल खिलने लगते हैं,सरसों,प्यूली,बुराश,सिल फोड़ा,आड़ू,खुमानी,सेब, नाशपाती,मेंहल आदि के वृक्षों कि सुन्दरता मनमोह लेती है। वैशाख मास को हमारे इस अंचल में बुढ़े पन “वृद्ध अवस्था” का प्रतीक भी माना गया है और इस दिन वृद्ध लोगों के सम्मान में” बूढ़ कौतिक ” मनाया जाता है।इस दिन से वादि लोक गायकों के द्वारा अपने अपने गुसाइयों के घर घर जाकर लोक गीत गाकर चैती पसारा नामक भेंट प्राप्त की जाती है।ग्रामीण अंचलों में इस पूरे माह भर लोक गीतों लोक नृत्यों कि यह छटा देखते ही बनती है ।
इस अंचल में आज भी कई गांवों में होलियों का प्रचलन न होकर पूरे चैत्र माह भर लोक गीत व फाग खेले जाते हैं। चैत्र माह से जुड़ी कुछ और लोक मान्यताओं को अगले अंक में आपके साथ सांझा करूंगा ।
आप सभी महानुभावों को भारतीय नववर्ष चैत्र प्रतिपदा के स्वागत के इस त्योहार फूल संक्रांति के पावन पर्व कि हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।

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