आलेख बृजमोहन जोशी,नैनीताल।
नैनीताल:- भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं में अनेक विविधताओं की झलक प्रत्येक अंचलों में उसके उत्सवों त्यौहारों में परिलक्षित होती है।कुमाऊनी ग्रामीण अंचलों में भी ये पर्व तथा उत्सव बड़े उल्लास के साथ आत्मसात होकर जुड़े हैं।ऐसा ही एक पर्व है “दशौर”/श्री गंगा दशहरा।
यह पर्व सम्पूर्ण भारत वर्ष में ज्येष्ठ सुदी दशमी तिथि को गंगा जी की जन्म तिथि के रूप में मनाया जाता है।कुमाऊनी ग्रामीण अंचलों में इस पर्व के अवसर पर बागेश्वर,कोटेश्वर, भीमेश्वर,आदि देवालयों में धर्मोत्सव रहता है।गंगा अवतरण की कथा पुराणों में इस प्रकार मिलती है जब वामन अवतार कर विष्णु भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांग ली और उसे नापने के समय विशाल विराट स्वरूपी त्रिविक्रम होकर इन्होंने तीनों लोक नाप लिये तब उस समय ब्रह्मा जी ने इनका चरणोदक लेकर अपने कमण्डल में भर लिया।उसी से गंगा जी अवतरित हुई अर्थात इस कथा के अनुसार गंगा जी की उत्पत्ति भगवान विष्णु के वामन अवतार के चरणों से हुई मानी जाती है।ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्री गंगा दशहरा मनाया जाता है। यह गंगा माता का जन्मोत्सव भी है।दशमी शुक्लपक्षे तु ज्येष्ठमासे बुधेऽहनि।
अवतीर्णी यत: स्वर्गाद्धस्तक्षे व हरिद्रा।। धरती पर गंगा जी का अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को हुआ।अतः यह तिथि उनके नाम पर गंगा दशहरा नाम से प्रसिद्ध हुई।इस तिथि को यदि सोमवार और हस्त नक्षत्र हो तो यह तिथि सब पापों का हरण करने वाली होती है।ज्येष्ठ शुक्ल दशमी सम्वत्सर का मुख कही जाती है इस दिन स्नान व दान का विशेष महत्व है।इस तिथि को गंगा स्नान एवं श्री गंगा जी के पूजन से दस प्रकार के पापों (तीन कायिक,चार वाचिक तथा तीन मानसिक)पापों का नाश होता है इसलिए इसे दशहरा कहा गया है।
ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशमी हस्तसंयुता।हरते दश पापानि तस्माद दशहरा स्मृता।।(ब्रह्म पुराण)
इस दिन गंगावतरण की कथा सुनने का विधान है।कुमाऊनी पर्वतीय ग्रामीण अंचलों में इस अवसर पर कुल पुरोहितों,पण्डितों/आचार्यों के द्वारा अपने अपने यजमानों के लिए वानस्पतिक रंगों की सहायता से ज्यामितीय विधि द्वारा हस्तलिपि में तैयार कमल दल के केन्द्रिक वृत का अंकन किया जाता है,और अपने अपने यजमानों को इसे प्रतिष्ठित कर आठ-दस दिन पूर्व घरों,द्वारों पर लगाने हेतु दिए जाते हैं।जो कि विस्तार तथा विकास का द्योतक भी है।कभी कभी इस अंकन के केन्द्र में(गणेश,शिव,हनुमान,व गंगा) चित्र बनाये जाते हैं।इस वृताकार चित्र की परिधि पर संस्कृत में मंत्र लिखा जाता है -द्वार पत्र ” दशौर” मंत्र-
” श्री गणेशाय नमःअगस्तस्य पुलस्तस्य वैशम्पायनैवच जैमिनीश्च सुमनतश्च पंचते वज्र वारका:मुने कल्याण मित्रस्य जैमिने श्रवानु कीर्तीनात विद्युदग्नि भंय नास्ति लिखियते च गृहोदरे” ।
अर्थात-कि अगस्त पुलस्त्य वैशम्पायन जैमिनी और सुमंत बज्र से रक्षा करने वाले हैं।लोक मान्यता है कि इस द्वार पत्र को लगाने से वर्षा ऋतु में आकाशीय बिजली,तड़ित,बज्र घातों दैवी आपदाओं से घर की सुरक्षा होती है।इसीलिए इस द्वार पत्र दशौर को मुख्य द्वार पर लगाया जाता है।इस वृत के बाहर अनेक कमल दल भी अंकित किये जाते हैं जो कि सृष्टि के विकास के द्योतक हैं।श्रुति में कहा गया है कि भारत वर्ष में मनुष्यों द्वारा उपार्जित करोड़ों जन्मों के पाप गंगा जी की वायु के स्पर्श मात्र से नष्ट हो जाते हैं।सामान्यतःगंगा में स्नान करने की अपेक्षा चंद्रग्रहण व सूर्यग्रहण के अवसर पर गंगा में स्नान करने से करोड़ों गुना अधिक पुण्य कहा गया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार – जेठ माह में गंगा का सेवन बहुत ही हितकर माना गया है।
आप सभी महानुभावों को श्री गंगा दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।



