श्री हनुमान जयंती पर विशेष: भक्तों के कष्ट और बाधाओं को दूर करने वाले देवता हैं ‘संकटमोचन’।

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आलेख:- बृजमोहन जोशी,/आचार्य पण्डित कथावाचक भुवन चंद्र त्रिपाठी।

(हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल पूर्णिमा व्रत दिनांक ०१-०४-२०२६ को तथा हनुमान जयंती दिनांक ०२-०४-२०२६ को)


नैनीताल:- श्री हनुमान जयंती की तिथि के विषय में दो मत प्रचलित हैं। पहला मत है चैत्र शुक्ल पूर्णिमा और दूसरा मत है कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी। चैत्र पूर्णिमा के दिन उत्तर भारत में विशेष तौर से हनुमान जयंती मनाई जाती है। और कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी अर्थात नरक चतुर्दशी के दिन दक्षिण भारत में यह अधिक मनाई जाती है। इस विषय में पौराणिक मान्यतानुसार –
श्री रामावतार के समय ब्रह्मा जी ने देवताओं को वानर और भालुओं के रूप में पृथ्वी पर प्रकट होकर श्रीराम की सेवा करने का आदेश दिया था। इनमें वायु के अंश से स्वयं रूद्रावतार महावीर हनुमान जी ने जन्म लिया था। इनके पिता वानर राज केसरी और माता अंजना देवी थी। जन्म के समय इन्हें क्षुधा पीड़ित देखकर माता अंजना देवी वन से फल लाने चली गयी,उधर सूर्योदय के अरूण बिम्ब को फल समझकर बालक हनुमान ने छ्लांग लगायी और पवन वेग से जा पहुंचे सूर्यमंडल। उस दिन राहु भी सूर्य को ग्रस ने के लिए सूर्य के समीप पहुंचा था। हनुमान जी ने फल प्राप्ति में अवरोध समझकर उसे धक्का दिया तो वह घबराकर इन्द्र के पास पहुंचा । इन्द्र ने सृष्टि की व्यवस्था में विघ्न समझकर बालक हनुमान पर वज्र से प्रहार किया, जिससे हनुमान जी की बायीं ओर से ठुड्ढी (हनु) टूट गयी। अपने पुत्र पर वज्र से प्रहार से वायु देव अत्यन्त क्षुब्ध हो गये और उन्होंने अपना संचार बंद कर दिया। वायु ही प्राण का आधार है, वायु के संचरण के अभाव में समस्त प्रजा व्याकुल हो उठी। समस्त प्रजा को व्याकुल देख प्रजापति पितामह ब्रह्मा सभी देवताओं को लेकर वहां गये, जहां अपने मूर्छित शिशु हनुमान को लिए वायु देव बैठे थे। ब्रह्मा जी ने अपने हाथ के स्पर्श से शिशु हनुमान को सचेत कर दिया। सभी देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र शस्त्रों से अवध्य कर दिया। पितामह ने वरदान देते हुए कहा – मारूत तुम्हारा यह पुत्र शत्रुओं के लिए भंयकर होगा। युद्ध में इसे कोई भी जीत नहीं सकेगा। रावण के साथ युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाकर यह श्री राम जी की प्रसन्नता का सम्पादन करेगा।
“आश्विनस्यासिते पक्षे भूतायां च महानिशा।
भौमवारेऽञ्जनादेवी ‌हनूमन्तमजीजनत”।।

आश्विन (कार्तिक) कृष्ण चतुर्दशी भौमवार की महानिशा (अर्धरात्रि) में अंजना देवी जी के उदर से हनुमान जी का जन्म हुआ था। अतः हनुमत – उपासकों को चाहिए कि वे इस दिन प्रातः स्नानादि करके “मम शौयौंदार्यधैर्यादिवृद्दयर्थ हनुमत्प्रीतिकामनया हनुमज्जंयंतीमहैत्सवमहं करिष्ये”! यह संकल्प करके हनुमान जी का यथा विधि षोडशोपचार पूजन करें।
यद्यपि अधिकांश उपासक इसी दिन हनुमान जयंती मनाते हैं और व्रत करते हैं, परन्तु शास्त्रान्तर में चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को हनुमान जन्म का उल्लेख किया है। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमान जयंती मनाने का यह कारण है कि लंका विजय के बाद श्रीराम अयोध्या आये। पीछे भगवान श्रीराम चन्द्र जी और भगवती जानकी जी ने वानरादि को विदा करते समय यथायोग्य पारितोषिक दिया था। उस समय उसी दिन सीता जी ने हनुमान जी को पहले तो अपने गले की माला पहनायीं, जिसमें बड़े बड़े बहुमूल्य मोती और अनेक रत्न थे, परन्तु उसमें राम नाम न होने से हनुमान जी उससे संतुष्ट न हुए। तब सीता जी ने अपने ललाट पर लगा हुआ सौभाग्य द्रव्य सिन्दूर उन्हें प्रदान किया और कहा -” इससे बढ़कर मेरे पास अधिक महत्व की कोई वस्तु नहीं है,अत एवं तुम इसे हर्ष के साथ धारण करो और सदैव अजर अमर रहो।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मां सीता से अमर होने का वरदान प्राप्त होने से यह उनकी नई जन्म तिथि है और स्कन्द पुराण के अनुसार – चैत्र मासि सिते पक्षे पूर्णिमायां तिथौ शुभे।अंजना गर्भसम्भूत: हनुमान पवनात्मज: ।।
नारद पुराण व स्कन्द पुराण के अनुसार – कार्तिक महीने में
हनुमान जी की जयंती के विषय में बताया गया है कि-कार्तिक कृष्ण पक्षे तु चतुर्दश्यां शुभे दिने । स्वत्यां जातो हनुमान लोकानां हितकाम्यया।।
यही कारण है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमान जन्म महोत्सव मनाया जाता है और उन्हें तेल सिन्दूर चढ़ाया जाता है। इन दोनों का ही अपना विशेष महत्व है।
आप सभी महानुभावों को हनुमान जयंती की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।

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