“अक्षय तृतीया” नवान्न का पर्व,शुभ और समृद्धि के साथ भगवान परशुराम की जयंती।

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आलेख:- बृजमोहन जोशी, नैनीताल।

नैनीताल:- भारतीय लोक मानस सदैव से ऋतु पर्व मनाता रहा है। हर ऋतु के परिवर्तन को मंगल भाव के साथ मनाने के लिए व्रत,पर्व, और त्योहारों की एक श्रृंखला लोक जीवन को निरन्तर आबद्ध किए हुए हैं। इसी श्रृंखला में अक्षत तृतीया का पर्व वसंत और ग्रीष्म के संधिकाल का महोत्सव है। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत-पर्व लोक में बहु क्षुत और बहु मान्य है। भविष्य पुराण के अनुसार सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है, इसलिए इसका नाम अक्षय पड़ा है। यदि यह तृतीया कृतिका नक्षत्र से युक्त हो तो विशेष फल दायिनी होती है। भविष्य पुराण यह भी कहता है कि इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है। क्योंकि कृतयुग (सत्ययुग) का (कलप भेद से त्रेता युग का) प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ है। किसानों के लिए यह नव वर्ष के प्रारम्भ का शुभ दिन भी माना जाता है।इस दिन कृषि कार्य का शुभ और समृद्धि देगा ऐसा विश्वास किया जाता है।
इसी दिन बद्रीकाश्रम में बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं।इस दिन मृत पितरों का तिल से तर्पण,जल से तर्पण और पिंडदान भी इस दिन इस विश्वास से किया जाता है कि इसका फल अक्षय होगा।
इस तृतीया को परशुराम जी की जयंती भी मनाई जाती है।
भगवान परशुराम स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनकी गणना अष्ट चिरंजीवियों में सम्मिलित दशावतारों में भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर में उच्च के छः ग्रहों से युक्त मिथुन राशि पर राहु के स्थित रहते माता रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम का प्रादुर्भाव हुआ।
इस प्रकार अक्षय तृतीया को भगवान परशुराम का जन्म माना जाता है। भगवान परशुराम महर्षि जमदग्नि के पुत्र थे।पुत्रोत्पत्ति के निमित्त इनकी माता तथा विश्वामित्र जी की माता को प्रसाद मिला था,जो दैववशात आपस में बदल गया था। इससे रेणुका पुत्र परशुराम जी ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे, जबकि विश्वामित्र जी क्षत्रिय कुलोत्पन्न होकर भी ब्रह्मर्षि हो गये।
जिस समय इनका अवतार हुआ था, उस समय पृथ्वी पर दुष्ट क्षत्रिय राजाओं का बाहुल्य हो गया था। उन्हीं में से एक सहस्त्रार्जुन ने इनके पिता जमदग्नि का वध कर दिया था, जिससे क्रुद्ध होकर इन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को दुष्ट क्षत्रिय राजाओं से मुक्त किया। भगवान शिव के दिए अमोघ परशु (फरसे) को धारण करने के कारण इनका नाम परशुराम पड़ा। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है।
यह भी उल्लेख है कि इन्होंने लाखों हैहय वंशियों का वध किया था। श्रीमद् भागवत के अनुसार – हैहय वंश का अन्त करने के लिए ही स्वयं भगवान विष्णु ने अंशावतार धारण किया था।
यह पावन पर्व सभी को अन्याय, अनीति, अत्याचार से लड़ने तथा साहस, शौर्य, धर्म और त्याग के आदर्श को जीवन में अपनाने की प्रेरणा लेकर आता है।
आप सभी महानुभावों को अक्षय तृतीया व परशुराम जयंती की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।

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